सज़ा के तौर पर दुनिया बसाना


सज़ा के तौर पर दुनिया बसाना
गुनह कितना हसीं था सेब खाना


रहा अव्वल तेरे हर इम्तिहां में
खुदा अब बंद कर दे आजमाना


चढ़े सूरज का मुस्तकबिल यही है
किसी छिछली नदी में डूब जाना 


दलीलें पेश करके थक चुका हूँ
सुना दो फैसला जो हो सुनाना


खुदा मैं पास तेरे आ तो जाऊं
जमीं का कर्ज बाकी है चुकाना


तुम्हारी खूबियाँ जब जानता हूँ
तुम्हारी खामियों को क्या गिनाना


महो अंजुम को है जब रश्क तुमसे
किसी इंसान को क्या मुह लगाना 


समंदर मौजज़न आँखों में है जो
उसे दरिया बनाकर क्यूँ बहाना


हमें मंजिल दिखाई दे रही है
"ज़रा आगे से हट जाए ज़माना"
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हुआ है उनको ज़ुकाम साहिब


रुला रुला के जो मार डाले उसी के हाँथों निज़ाम साहिब
मिलेगा मौका तो हम भी लेंगे शदीद तर इंतकाम साहिब

हुआ नही है कभी जहाँ पर शरीफ़ का एहतिराम साहिब
तो भूल कर भी किया नही है वहाँ पे मैंने कयाम साहिब

सहा जो बेहुर्मती बुलाते थे प्यार से मुझको महफ़िलों में
हुआ मुझे इल्म तो नही है कोई भी उनका पयाम साहिब

मुगालते में है एक बच्चा करेगा वो सब की रहनुमाई
थमा दिया है शराबियों ने उसी के हाँथों में जाम साहिब

वो जिसकी जुल्फों की भीनी खुशबू कई को पागल बना चुकी है
उसी कि खातिर किये पड़े हो तुम अपनी नीदें हराम साहिब

पचा हज़ारों करोड़ जिनको लगी नही थी तनिक भी गर्मी
लगी जो इन्साफ की हवा तो हुआ है उनको ज़ुकाम  साहिब

नहीं पता था उन्हें कि नादां कि दोस्ती बस जलन है जी की
सम्हल भी पाते के कब्ल उसके उजड चुके थे इमाम साहिब

बहुत ही खुदगर्ज़ है ज़माना संभल के चलना बचा बचा कर
तुम्हे पता भी नही चलेगा किया क्यूँ तुमको सलाम साहिब

जो मजहबी चाशनी में इंसानियत डुबो कर सटक रहे हैं
खुदा करे अब चुकायें वो भी कोई तो माकूल दाम साहिब

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न होते आँखों में आँसू तो रिश्ते जल गए होते


न  होते आँखों में आँसू तो रिश्ते जल गए होते
न पीती अश्क माँ, रिश्तों को रिश्ते खल गये होते

है डसना धर्म जिनका पालतू बनते नही हैं वो
नही तो आज घर घर सांप विषधर पल गये होते

निडर हो घूम सकते हो अगर हुंकार में दम है
इसे तुम भी समझ जाते अगर जंगल गये होते

समय पर आख खुल जाना बडी नेमत खुदा की है
तुझे रुसवा जो  करते हम तो खुद को छल गए होते

चलो अच्छा हुआ तुमने जो मुझसे फेर लीं नजरें
बगरना खामखाँ आँखों में सपने पल गए होते

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कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गाँव में


कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गाँव में
पीढ़ियों की ये निशानी हैं अभी तक गाँव में
वक़्त रोने और हँसने का हमें मिलता नहीं
छोरियाँ कजरी सुनाती हैं अभी तक गाँव में
शादियों के जश्न में जेवनार पर समधी हँसे
गालियाँ लगती सुहानी हैं अभी तक गाँव में
बेटियों सा प्यार बहुएँ पा रहीं शायद तभी
सास के वो पाँव धोती हैं अभी तक गाँव में
आपसी रिश्तों में तल्खी आ नही पाती यहाँ
छोहरी, बायन औ सिन्नी  हैं अभी तक गाँव में
हैं हठीले आज भी गावों में सच्ची सोच के
बातें सच्ची हैं तो सच्ची हैं अभी तक गाँव में
छोहरी – रबी की फसल घर में आने पर सबसे पहले सत्तू बनाकर गाँव भर के छोरों छोरियों को खिलाया जाता है
बायन – शादी या गौने की बिदाई में बहू के साथ आये लड्डू आदि मिठाइयों को गाँव भर में बांटा जाता है
सिन्नी – गन्ने से खांड और गुड बनाने पर पहले पाग से बच्चों को खिलाया जाता है
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कोंख में कविता


आज पूरी रात
सो नही पायी मैं
सुखाती रही
गीले शब्दों को
गर्म साँसों की आँच पर
आंसुओं ने
कर दिया था विद्रोह
गिरते रहे टप टप टप
भावों की भट्ठी पर
बुझाते रहे सुलगते विचारों को
और मैं लिख न सकी
कुछ भी
अपनी सृजन शीलता पर आश्वस्त
मैं दांत भींचे सहती रही
अजन्मी कविता की प्रसव-वेदना
नहीं हुआ कोई असर
बादलों से मिले प्रोत्साहन का भी
खूब बढ़ाया मनोबल
पर स्वयं ही बरस गये
और
हो गए पानी पानी
मुझे विशवास है
जन्म लेगी एक दिन
एक सुन्दर, सलोनी कविता
मेरी कोंख से
और भर जायेगी
मेरी सूनी गोंद

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ये क्या हुआ कि आज बिखरने लगा हूँ मैं


ये क्या हुआ कि आज बिखरने लगा हूँ मैं
आहट से खामुशी के भी डरने लगा हूँ मैं

मंजिल की है खबर न किसी राह का पता
अब कैसी मुश्किलों से गुजरने लगा हूँ मैं

रहने लगा है साया मेरा मुझसे दूर दूर
ऐसा गुनाह कौन सा करने लगा हूँ मैं

जिसकी हँसी पे था मैं दिलो जान से फ़िदा
मुस्कान पर भी उसकी, सिहरने लगा हूँ मैं

आईना मेरा मुझसे चुराने लगा नजर
क्या आख़िरी सफ़र को संवरने लगा हूँ मैं

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नेक इंसान हर इन्सां को भला कहते हैं


नेक इंसान हर इन्सां को भला कहते हैं
जो हैं कमज़र्फ, खुदा को भी बुरा कहते हैं

आज इंसान कई खुद को खुदा कहते हैं
‘जाने क्या दौर है क्या लोग हैं क्या कहते हैं’

आज आँखों में शरारत सी अयाँ है उनके
वो मेरी शर्म को भी शोख अदा कहते हैं

दोपहर ढूंढ रही शब की निशानी खुद में
हम इसी चाह की शिद्दत को नशा कहते हैं

बात क्या है कि तेरी याद रुलाती है हमें
लोग क्यूँ ‘प्यार हुआ’ ‘प्यार हुआ’ कहते हैं

दम घुटा जाए हो अहसासे गुनह से बोझिल
रूह धिक्कारे तुम्हे, इसको सज़ा कहते हैं

आज़माइश की हदें पार करूँगा हँस कर
दर्द बेहद हो, सुना उसको दवा कहते हैं

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