अमन का पैगाम


तुमको तो अब अच्छी तरह पहचान गए है
तुम दोस्त हो कि दुश्मन, ये जान गए हैं
पुट्ठे पे हाँथ रखता है, जब तेरा मददगार
सोचते हो, छुप के फिर हम पर करोगे वार
इंसान अपनी गलतियों से सीखता सबक
तूने खाई जैसे कसम, रहने की अहमक
पहले तू अपनी रसोई की रोटियाँ तो गिन
सो जाते है कितने ही तेरे बन्दे खाए बिन
बेहतर है पहले अपनी जरूरतों को जान
इंसानियत की सतही पहचान को पहचान
भूखा है गर तो तर्क कर अपने गुरूर को
मत माँग हमसे, याद तो कर उस हुजूर को
जिसने तुझे सूरत दिया सीरत न दे सका
अमन-ओ-ईमान से बनी जीनत न दे सका
हमसे है कुछ उम्मीद, तो तू इशारा तो कर
हम भीख भी देते हैं अपने हाँथ जोड़कर
हमने बचा के रखी है हर अख्तर-ए-उम्मीद
तबाही की मशाल से कर तर्क, है ताकीद
हम भेंज रहे हैं तुम्हे ये अमन का पैगाम
क़ुबूल कर या भेज सबको आखरी सलाम
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About sdtiwari

I am self employed professional engaged in Marketing and Product Launching.
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One Response to अमन का पैगाम

  1. बढ़िया प्रस्तुति …. आभार
    क्या बात है बहुत ही अच्छी पंक्तिया लिखी है …..

    हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं

    एक बार पढ़कर अपनी राय दे :-
    (आप कभी सोचा है कि यंत्र क्या होता है ….. ?)
    http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_13.html

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