Monthly Archives: October 2010

नियति


संध्या और उषा दो सगी बहने ब्याही गयीं सूरज के साथ पर विडम्बना देखिये दोने बेचारी अब कभी मिल न पातीं फिर भी अपना अपना उत्तरदायित्व निभाती हैं सूरज भी कहाँ खुश है उषा से अलग होकर संध्या से मिलने … Continue reading

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आजमाइश


मैं उसी की जिन्दगी में फिर से आना चाहता हूँ
संगदिली को उसकी मैं फिर आजमाना चाहता हूँ

जिसने मेरी जिन्दगी से छीन ली सारी खुशी
मैं उसी के वास्ते ही मुस्कराना चाहता हूँ

जिसने. मेरी. आँखों. में. बे इन्तेहाँ. आंसू. दिए
मैं उसी के पहलू में आँसू बहाना चाहता हूँ

चैन मेरी जिन्दगी से जिसने छीना बारहा
सब्र की मैं इन्तेहाँ उसको बताना चाहता हूँ

मेरे शिकवों से रही जिसको शिकायत उम्र भर
अपनी खामोशी को मैं उसको सुनाना चाहता हूँ

जिसने मुझको दूर रखा मेरी जिंदगी से ही
आज अपनी कब्र पर उसको बुलाना चाहता हूँ

है यकीं अब तो गले वो मेरे लग ही जायेगा
साथ अपने चैन से उसको सुलाना चाहता हूँ
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रावण जिन्दा है


क्या आपने देखा है आत्मदाह ? मैंने देखा है हर विजय दशमी पर देखा है कि रावण ही जलाता है रावण को और देता है भाषण करता है एलान कि हो गयी जीत बुराई पर अच्छाई की मन ही मन मुस्कराता है … Continue reading

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मेरी शायरी


आ जिंदगी, मुझे फिर से झेल
तेरे लिए मौत को फिर ना कर दी.

आती तो है ख़ुशी मेरे चेहरे पे भी मगर
जाती है ज्यूँ मजार से चादर उतार ली

बंद कर दे मुझपे अपनी आजमाइश ऐ ख़ुदा
मैं तेरे हर इम्तहाँ में अब तलक औव्वल रहा

दुश्मनों की दुश्मनी है काबिले ममनून
तो दोस्तों की दोस्ती, पुरकैफिए करार

जब तलक हम हँसते हँसते सह रहे थे, नेक थे
हकीकत लब पे क्या आयी, हम कमीने हो गए

बहुत दिनों से तमन्ना थी खुद को पाने की
शुक्रिया आपने मुझको मेरा पता बता दिया

तुमसे किया था वादा लब न खोलूँगा
वर्ना हर बात का जवाब है, कहो तो दू?

मेरी ख़ुशी का था कुछ रिश्ता मेरे मलाल से
अब तो वो भी न रहा, बह गया आंसू बन के

चढ़ा है आज जो जुनून मुझपे लिखने का
अपनों को खोने का ग़म, अपनी बेबसी है वज़ह

अपने दुःख तो सह जाता हूँ अपनों के दुःख सहे न जाते
काश वो लौट के फिर से आते फिर कुछ कानो में कह जाते

मेरा बेटा भी बिलकुल अपने दादा जैसा है
कहता है सच और उसपे डटा रहता है

मेरे नसीब में न था दूर तलक साथ उनका
अब तो बस यादों के सहारे कटेगा ये सफ़र

जम के आज हुई है बारिश यादों के इस सहरा में
फूल खिला दे मौला, तुझको भी माफ़ी मिल जाएगी

यहाँ पे तू तू और मैं मैं की गुंजाईश नहीं
यहाँ तो सिर्फ तू है,सिर्फ तू है,सिर्फ तू है

दर्दे दिल अब बढ चुका है हद से भी जादा
इसका धडकना बंद हो तो कुछ सुकूँ मिले

ये मेरी बेहयाई है कि उनकी वफ़ा है
मुझे दीदार कराने को हो जाते हैं बेनक़ाब

रास्ते बदलते रहना मेरी फितरत में नहीं
हम तो मंजिल को निशाना बना के चलते हैं

खामोशियों को सुनता हूँ मुझमे है ये हुनर
अँधेरे देख सकता हो, तो आ के गले मिल

अब तो बादल भी इंसान सी फितरत गाँठ लिए हैं
शहर तो क्या इन्होने तो मोहल्ले बाँट लिए हैं

जिन नज़रों के तीर से कितने गए मारे
हम जीने कि सोच रहे हैं उन्ही के सहारे

ऐसी तरक़ीब कोई दोस्त बताये मुझको
नीद भर सो लूँ, कोई ख़्वाब न आये मुझको

सारी खुशियाँ तर्क कर मैंने है जो पाया
औकात नहीं किसी की, खरीद ले मुझसे

आँखों से टपकने को है, संभालना इसे
आंसू नहीं मोती है, इसे सीप में रखना

तुम झूठ न बोलोगे, ये वादा कर लो
वादा रहा, किसी से मैं सच न कहूँगा

चलो करते हैं कोशिश कब तलक खुद को सतायेंगे
उन्ही की याद में हम रोते रोते सो ही जायेंगे

बारिश में एक बूँद को तरसता हूँ मैं
धूप पर बन के पसीना बरसता हूँ मैं

चाँद से चेहरे को तेरे चूमना चाहूँ, मगर
तारों की आँखों में कुछ कुछ बहम जैसा होता है

वो आदमी जहाँ में सब से खुशनसीब है
दिलबर का साथ जिसको हर सू नसीब है

लब्जों का इस्तेमाल जब बेनतीजा हो
होठों का इस्तेमाल करके देख लीजिये

सोचा था इनमे होगी शहद की मिठास
लेकिन तेरे होठों ने मुझको जला दिया

प्यार का परिमाण और परिणाम न देखो
नफरत में बदलने में इसे देर नहीं लगती

प्यार के बोल से मिट जाती है भूख
साँसे जूनी शराब का सुरूर देती हैं

प्यार के बारे मुझको इतना ही मालूम है
बिना इसके ये जहाँ एक मकबरा बन जाएगा

बेवफाई करता है वादा-ए- वफ़ा के साथ
आजमाते रहने से हम क्यों करे गुरेज

हमें पता है मंजिल है तेरी मेरा ही खाब
निकलना बच के रस्ते में कई लोग मिलेंगे

पीता नहीं शराब अब मैं, खुदा की कसम
नशा तो चढ़ता है मुझे, साकी को देख कर

ज़मीर मनाने नहीं देता खुशी दिल को
सुना है रहबर-ए-रकीब नाबीना हो गया

बाहों में तेरी सुनते हैं जन्नत का मजा है
लो ले लिया बाहों में तुम्हे जन्नत के साथ

बुरे काम का अनुभव अच्छी सीख दे अगर
तो बुरा काम भी कभी कभार अच्छा होता है

मेरा प्यार नासमझ न समझ सका तुम्हे
तुमसे क्या गिला तुम तो हो ही न समझ

अँधेरे में गुजारी हो सारी जिन्दगी जिसने
रोशनी में आँखें उसकी चौंधिया ही जायेंगी

कब तक छुपा के रखोगे अपने वजूद को
दिखाओ दुनियाँ को चेहरा, दुनियाँ सराहेगी

घर में दुश्मन बैठा हो तो लंका भी ढह जाय
भाई की जो मौत बने वो विभीषण कहलाय

इसे गुरूर मत समझो ये मेरा ऐतबार है
मैं रात को दिन कह दूँ तो सूरज निकल आये
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हमसफ़र


हाथों कि लकीरों को क्यूँ निहारा करते हो हाथों के दम पे क्यों नहीं सवांरा करते हो खुशियों के जिम्मेदार तुम कहते हो अपने को गम हो कोई मेरी तरफ इशारा करते हो अकेले दस कदम में थक के हो … Continue reading

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दिमाग का दही


आज लोगों मैं हूँ तैयार आप भी हो जाओ बनाते हैं,  दिमाग का दही चौकिये मत बन्धु बस मेरे साथ हो लीजिये दही तो अपने आप बनेगा ऐसा करिए ….. अपने दिमाग में सोनिया का त्याग डालो मनमोहन का भाग डालो युवराज कि आस डालो … Continue reading

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कशमकश


कोई नहीं कि गुनाहों से रोकता है मुझे मेरा जमीर ही अक्सर झिझोड़ता है मुझे कोई तदबीर ऐसी मुझको सूझती ही नहीं बेरहम दुनिया का दस्तूर टोकता है मुझे जिसने छीना है उसे मार तो डालूँ लेकिन तुम्हारी माँग का सिन्दूर रोकता है मुझे सोचता … Continue reading

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