Monthly Archives: November 2010

चाँद की औकात


चाँद को अपना मुखड़ा दिखा दीजिये
उसकी औकात उसको बता दीजिये
आपका दर तो क्या छोड़ दूँगा जहाँ
देख लूँ थोडा चिलमन हटा लीजिये
अपनी चाहत को कैसे करूँ मैं फ़ना
मुझको तदवीर कोई बता दीजिये
ख़ास तदवीर कोई जरूरी नहीं
गर भुलाना हो उनको भुला दीजिये
ऐन उस वक़्त जब वो इशारा करें
अपनी नजरों को उनसे हटा लीजिये
खूबसूरत हो तुम तो जावां मैं भी हूँ
और कोई कमी हो बता दीजिये
जान पाए कहाँ एक दूजे को हम
जानिये हमको, खुद का पता दीजिये
सोच लो जो भी जी चाहे मी लिए
अपने बारे में भी फैसला दीजिये
एक इंसान हूँ, मैं भी रखता हूँ दिल
मुझसे अपने को इक दिन मिला दीजिये
चाहते मेरी मुझसे परेशान हैं
खुद से मिलने का उनको रजा दीजिये
वो जो गुमराह थे काशी–काबा गये
“शेष” को अपने दर का पता दीजिये Continue reading

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आँसू बहाते रहे


कब्र पर बाद में भी वो आते रहे
दफ्न करके भी मुझको जलाते रहे

सांप को हम संपेरा बनाते रहे
बाद में खुद को उससे बचाते रहे

हम न समझे थे उनका इशारा, तभी
देख मुझको वो आँचल गिराते रहे

गम का मारा हँसा रोते रोते, जिसे
कह के पागल हमेशा बुलाते रहे

कोई साथी हमें मिल न जाए नया
मेरी यादों में चक्कर लगाते रहे

कह के मोती या दरिया मेरे अश्कों को
लोग मखौल मेरा उड़ाते रहे

बाद दफनाने के कौन उम्मीद थी
कब्र को देख आँसू बहाते रहे

मेरे दामन के कांटे न घायल करें
दूर फूलों से हम खुद ही जाते रहे

वो ख़ुशी से चला जाय, ये सोचकर
अपनी नाराजगी हम छुपाते रहे

संगदिल एक इंसान हमको मिला
मान भगवान उसको रिझाते रहे

हो गया शेष खारा समंदर जभी
बैठ साहिल पे आँसू बहाते रहे Continue reading

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नसीब


जैसा भी हो नसीब मगर दिन तो कटेगा
मुफ्लिस तो पेट के लिये दिन- रात खटेगा

पाओं में आबले हैं , बड़ी दूर मनाज़िल
पुरख़ार रास्ते है, चलो, दर्द बँटेगा

वाइज़ का मोज़िज़ा मै बहुत देख चुका हूँ
अब अपनी रोशनी से ये अन्धेर घटेगा

मुझको यकीं है वो जो अभी तक है तहाजुल
डट जाउँगा अगर तो मेरे साथ डटेगा

सब दे दिया है इसलिये बनना न खरीदार
मौला भी ताज़िरों को कयामत पे जटेगा

सबको गले लगाओ मगर सोच समझ कर
काँटो से दिल लगाओ तो दामन तो फटेगा

दुश्मन कोई नहीं है अगर जान लिया है
इल्ज़ामे- दुश्मनी भी तिरे सर से हटेगा
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गले लगाओगे


दूर रहके ही मुस्कराओगे
या करीब मेरे तुम आओगे

फिक्र अपनी नहीं तुम्हारी है
कैसे तुम जिंदगी बिताओगे

जागती आँखों में सोये कोई
नीद में मुझको ही सुलाओगे

मुझको भुलाना है नहीं आसाँ
कैसे इस बात को भुलाओगे

मिरी पुतली जो पलट जायेगी
बारहा मुझको तुम बुलाओगे

करोगे अपने से धोखा कबतक
हकीकत कब तक यूँ छुपाओगे

आजाओ , तुम जीते मैं हारा
अब तो खुश हो गले लगाओगे
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आँसू


काश उसके आँसू कोई पोंछता
आँसुओं से अपने घायल हो गया
देर तक रोता रहा फिर हँस पड़ा
लगता है वो सख्स पागल हो गया

एक बूँद आँसू को कह दिया मोती, और
आँसुओं की धार को दरिया की रवानी
आँख से जिनके गिरे उनसे तो पूछिए
आँसुओं की होती क्या इतनी सी कहानी
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ये क्या किया मैंने


रूह से झगडा मेरा सुलझा लिया मैंने
ख्वाहिशों को बेकफ़न दफना दिया मैंने

देखके उन्होंने मुझे अनदेखा किया
हाँथ अपना धीरे से बढ़ा दिया मैंने

झेल मुझको फिर से एक बार जिन्दगी
मौत को तेरे लिए फिर ना किया मैंने

चाहता हूँ बंद कर दे धडकना ये दिल
बेवजह इसको भी परीशां किया मैंने

जिन निगाहों से मरे कितने ही दीवाने
उनके सहारे जियूं फैसला किया मैंने

करो झूट न कहने का मेरे बारे में वादा
तुम्हारा सच न कहूँगा वादा किया मैंने

हर बात छिपा लेने की थी कोशिश उनकी
हर बात बता देने का वादा किया मैंने

उनके ही सर अकेले सब इलज़ाम क्यूँ जाए
होठो को अपने थोडा गीला किया मैंने

आप हैं जहाँ भी, है मेरी इबादतगाह
परवाह मंदिर मस्जिद की कब किया मैंने

औकात किसी की नहीं कि खरीद ले मुझसे
खुशियों के बदल जो भी हासिल किया मैंने

हर किसी को चेहरा अपना साफ़ ही दिखे
आईने को इसलिए चमका लिया मैंने

उनको चश्मेतर देखा अपनी हालत पे
दुनियाँ से लड़ने का हौसला किया मैंने

शिद्दत से निभाते हैं वो मुझसे दुश्मनी
चाहतें पूरी हो उनकी दुआ किया मैंने

अब सह नहीं पाता मायूस सूरत उनकी
रो दूँगा जो उनकी ओर देख लिया मैंने

एखलाक भी होता है दुनियाँ में जरूरी
महफ़िल में उन्हें देख मुस्करा दिया मैंने

उकता गया था ढो के बेगुनाही का बोझ
चुपके से आज इक गुनाह कर लिया मैंने

काटता गर्दन कोई मिलते मुझको खुदा
इसी उम्मीद बारहा सिजदा किया मैंने

आप तो चलने को मेरे साथ थे तैयार
मैंने खुदा हाफ़िज़ कहा ये क्या किया मैंने
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करता हूँ मैं प्यार


मैं करता हूँ प्यार जिसे है स्वयं प्यार की मूरत
देख देख बस जीता जाऊं है ऐसी वो सूरत

अपने कोमल स्पर्श मात्र से दुःख मेरा हर लेती
निश्छल उसकी हँसी मुझे दुनियाँ का सब सुख देती

पैरों के नाखून दिखें ज्यूँ घाटी नीचे झील
पावों के तलवे यूँ जैसे सूरज लीना लील

पंजे जैसे हिमखंडों से नीचे उतरे नीर
पाँव सुघड़ उत्साह भरे चलने को रहें अधीर

उसकी गोंदी बैठ विधाता रचते सृष्टि विधान
अंग लगे जो मृत शरीर आ जाए उसमे जान

ग्रीवा जैसे संगमरमरी मूरत बिन श्रृंगार
होठ गुलाबी व्यक्त करें इक दूजे का आभार

गालों की लालिमा चमकती ज्यों उषा की लाली
सुघर नासिका करती जैसे बगिया की रखवाली

भाल चमकता स्नेह सिक्त ज्यों मोती का कंगूरा
केश फहरते ऐसे ज्यों बादल खा जाए धतूरा

ऐसी ईश्वर की रचना से करता हूँ मैं प्यार
मेरे जीवन पर है बस इस रचना का अधिकार
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