Monthly Archives: December 2011

कोंख में कविता


आज पूरी रात सो नही पायी मैं सुखाती रही गीले शब्दों को गर्म साँसों की आँच पर आंसुओं ने कर दिया था विद्रोह गिरते रहे टप टप टप भावों की भट्ठी पर बुझाते रहे सुलगते विचारों को और मैं लिख … Continue reading

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ये क्या हुआ कि आज बिखरने लगा हूँ मैं


ये क्या हुआ कि आज बिखरने लगा हूँ मैं आहट से खामुशी के भी डरने लगा हूँ मैं मंजिल की है खबर न किसी राह का पता अब कैसी मुश्किलों से गुजरने लगा हूँ मैं रहने लगा है साया मेरा … Continue reading

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नेक इंसान हर इन्सां को भला कहते हैं


नेक इंसान हर इन्सां को भला कहते हैं जो हैं कमज़र्फ, खुदा को भी बुरा कहते हैं आज इंसान कई खुद को खुदा कहते हैं ‘जाने क्या दौर है क्या लोग हैं क्या कहते हैं’ आज आँखों में शरारत सी … Continue reading

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लो, सियासत रंग दिखलाने लगी


लो, सियासत रंग दिखलाने लगी हर सड़क फिर गाँव को जाने लगी खामुशी जब आज चिल्लाने लगी रात अंधियारे से घबराने लगी चल पड़ी फिर से सियासत की हवा बादलों की खेप मडराने लगी जो गरीबी भूख से बेहाल थी … Continue reading

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