Monthly Archives: April 2012

सज़ा के तौर पर दुनिया बसाना


सज़ा के तौर पर दुनिया बसाना गुनह कितना हसीं था सेब खाना रहा अव्वल तेरे हर इम्तिहां में खुदा अब बंद कर दे आजमाना चढ़े सूरज का मुस्तकबिल यही है किसी छिछली नदी में डूब जाना  दलीलें पेश करके थक चुका हूँ सुना … Continue reading

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