लो, सियासत रंग दिखलाने लगी


लो, सियासत रंग दिखलाने लगी
हर सड़क फिर गाँव को जाने लगी

खामुशी जब आज चिल्लाने लगी
रात अंधियारे से घबराने लगी

चल पड़ी फिर से सियासत की हवा
बादलों की खेप मडराने लगी

जो गरीबी भूख से बेहाल थी
हाजमे की गोलियाँ खाने लगी

फिर से उम्मीदों की लालीपाप ले
मुफलिसी भी नाचने गाने लगी

सारी धरती पर चमकने के लिए
बदलियों को धूप बहकाने लगी

Advertisements
Posted in Uncategorized | Leave a comment

गुलों को खूं बहाना आ गया है


गुलों को खूं बहाना आ गया है
खुदा! कैसा ज़माना आ गया है

उन्हें गुस्सा दिखाना आ गया है
हमें भी मुस्कराना आ गया है

करेंगे प्यार हम भी अब किसीसे
हमें भी दिल दुखाना आ गया है

हँसी खुलकर दिखेगी अब हसीं की
हमें आंसू छुपाना आ गया है

पिटे जब खुद किसीसे, याद उनको
अहिंसा का फ़साना आ गया है

Posted in Uncategorized | Leave a comment

किसी की तर्बियत पर आप यूँ मत हाँथ मलिए जी


किसी की तर्बियत पर आप यूँ मत हाथ मलिए जी

खुद अपनी काबिलीयत पर जरा विश्वास रखिये जी

 

फक़त मोहरे बदल देने से कुछ हासिल नही होता

अगर हो जीतनी बाज़ी तो उम्दा चाल चलिए जी

 

दयारे-संग में भी हैं बसे कुछ मोम क़े इन्सां

ज़रा माहौल ठंडा आप अपने पास रखिये जी

 

मेरी हर सांस के आरोह और अवरोह से हट कर

मेरी धडकन के झूले पर ज़रा आराम करिये जी

 

सुखनवर आप हैं गर, बच के रहिये कज अदाई से

अगर हैं आप तालिब, ‘शेष’ के उस्ताद बनिए जी

Posted in Uncategorized | Leave a comment

बेबसी में हम कभी रोते कभी हँसते रहे


बेबसी में हम कभी रोते कभी हँसते रहे
मुश्किलों से बारहा हर हाल में लड़ते रहे

ज़िंदगी की आंच में जो मोम सा गलते रहे
वो मुसलसल वक़्त के सांचे में ही ढलते रहे

आज से बेहतर रहेगा कल इसी उम्मीद में
ज़िंदगी में कुछ सुहाने ख्वाब तो पलते रहे

बेगुनाही की सजा कोई सहेगा कब तलक
हो न तौहीने अदालत हम गुनह करते रहे

दे रहे फांसी सलीबों को सियासतदां यहाँ
फैसले दे कर भी मुंसिफ हाँथ ही मलते रहे

जब भी भ्रष्टाचार की दरिया से टूटा सब्रे बंद
लोग सड़कों पर उतर कर फैसले करते रहे

Posted in Uncategorized | Leave a comment

जो इन्सां को इन्सां नहीं मानते हैं


जो इन्सां को इन्सां नहीं मानते हैं
यकीनन खुदा को नहीं जानते हैं

यूँ रूठे हैं जैसे हों किस्मत हमारी
न वो मानती है न ये मानते हैं

हम इंसान की बस्तियाँ ढूँढने को
जमीं छोड़ कर आसमां छानते हैं

जब अपनों से खाते हैं धोखे पे धोखा
तभी पार्थ गांडीव संधानते हैं

पड़े उनकी दुखती हुई रग पे उंगली
वो नजरें हटा कर भवें तानते हैं

Posted in Uncategorized | Leave a comment

बसंत


बसन्ती आग में मुझको जलाओ
न लो अंगडाइयाँ, अब पास आओ

दिखेंगे बौर अब अमराइयों पर
उन्हें सोचो, लजाओ, मुस्कराओ

रखोगे मन में कब तक चाह मन की
नयी कोपल दिखेंगी, मन बनाओ

टहनियाँ मिल गले कुछ पूंछती हैं
कि पहले तुम बताओ, तुम बताओ

हंसीं कुदरत का देखो ये नज़ारा
गले मिल साथ में खुशियाँ मनाओ

Posted in Uncategorized | Tagged | Leave a comment

बसंत का स्वागत


बसन्ती आग में मुझको जलाओ
न लो अंगडाइयाँ, अब पास आओ
दिखेंगे बौर अब अमराइयों पर
उन्हें सोचो, लजाओ, मुस्कराओ
रखोगे मन में कब तक चाह मन की
नयी कोपल दिखेंगी, मन बनाओ
टहनियाँ गले मिल कुछ पूंछती हैं
कि पहले तुम बताओ, तुम बताओ
हंसीं कुदरत का देखो ये नज़ारा
सराहो इन्हें औ खुशियाँ मनाओ ………………शेष धर तिवारी १-२-११
Posted in Uncategorized | Tagged | Leave a comment