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सज़ा के तौर पर दुनिया बसाना


सज़ा के तौर पर दुनिया बसाना गुनह कितना हसीं था सेब खाना रहा अव्वल तेरे हर इम्तिहां में खुदा अब बंद कर दे आजमाना चढ़े सूरज का मुस्तकबिल यही है किसी छिछली नदी में डूब जाना  दलीलें पेश करके थक चुका हूँ सुना … Continue reading

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